मिल रहा था वो बोहोत मुद्दत से हकीकत नही ख्वाब है शायद मेरे तजुर्बों ने ये सिखाया मुझे बिछड़ना भी इक सबाब है शायद बदन में तेरी महक आने लगी यादों का तेरी रुआब है शायद मौसिकी बंदगी से अाई है रूह में उसका नाम है शायद गुनाह माफ का खत लिख भेजा है मेरे कातिल का नाम है शायद
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अपना बना लो मुझे
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कैसे कहूँ की अपना बना लो मुझे , बाँहों में अपनी समा लो मुझे, बिन तुम्हारे एक पल भी अब कट ता नहीं, तुम आ कर मुझि से चुरा लो मुझे, ज़िन्दगी तो वह है सन्ग तुम्हारे जो गुज़रे, दुनिया के गमों से अब चुरा लो मुझे, मेरी सब से गहरी खुवाहिश हो पूरी, तुम अगर पास अपने बुला लो मुझे यह कैसा नशा है जो बहका रहा है,, तुम्हारा हूँ मैं तो संभालो मुझे नजाने फिर कैसे गुज़रे ज़िंदगानी अगर अपने दिल से कभी तुम निकालो मुझे
Yaadein
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सूनी सी एक राह , उस पर गहरें से कुछ निशा , किसी की सहमी हुई यादों के .. सिसकते हुए कुछ वादों के .. दर्द से करहाती हुई रौशनी ... धुंए में धुंदलाती से एक ख़ुशी .. आँखों को भिगोती हुई कुछ बूँदी .. कानो से गुजरती हुई कुछ अवाज़ी .. किसी के आने की वह आहत ... वक़्त के रुक जाने की वह चाहत .. वह डूबता हुआ सूरज .. वह शरमाते हुए सितारे .. सूखे पत्तों से खेलती हुई वह हवा ... खिड़की से झांकती हुई वह रातें .. चुपके से याद आती हुई वह बातें .. आसमान को छूने की वह कोशिश .. किसी को पाने की वह खुवाईश हाथों में सिमटी सी एक लकीर .. आँखों मैं चिप्पि सी एक तस्वीर .. वह खुद ही रूठना .. वह खुद ही मानना .. वह मुट्ठी में बंद कुछ सपने .. वह बिछडी हुए कुछ अपने .. गुजरता हुआ हर पल यही .. बहका हुआ कुछ - कुछ कहीं .. खामोश सी है लहरैं सभी .. खो गयी ज़िन्दगी कहीं .. थम सा गया सब कुछ .. पर वक़्त है पता न...