मिल रहा था वो बोहोत मुद्दत से
हकीकत नही ख्वाब है शायद
मेरे तजुर्बों ने ये सिखाया मुझे
बिछड़ना भी इक सबाब है शायद
बदन में तेरी महक आने लगी
यादों का तेरी रुआब है शायद
मौसिकी बंदगी से अाई है
रूह में उसका नाम है शायद
गुनाह माफ का खत लिख भेजा है
मेरे कातिल का नाम है शायद
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